Monday, 18 May 2026

जनकपुर साहित्य महोत्सव : एक विहंगम दृष्टिकोण (Janakpur Literature Festival: A Panoramic Perspective)

प्राचिन मिथिलामें स्तुतिगान करैवालाके उँच पिढिया पर बैठेबाक चलन छल, ओ अखनोधरि जारी अछि । तईँ एतह व्यक्तिके चालिसा पाठ होएत अछि । पक्षमे घडिघंट बजबैवाला बाहेक दोसरके पुछारी कमे होएत आयल अछि । घंटा बजबैवालाकेँ सम्मान कथित अभियानी सभ कहियो नहि देलक, कियक त ओ वर्चस्प पर चोट कसैत अछि । घडिघंटि डोलके बजैत अछि, मुदा घंटा तानिके वा अपना दिसि खिचके बजाओल जाएत अछि । प्रशंसाके भुखल लोक, स्तुतिगानमें आत्मरतिलिन लोकैन सभ एहि प्रराक्रममें बहुतोंकेँ भविष्यमे गदहा जनम सँ मुक्ति करबाक ध्यानमग्न रहैत छथि ।
✍ दिनेश यादव
जनकपुरधाम धार्मिक, सांस्कृतिक आ भाषिक त्रिवेणी संगम स्थल अछि । आब ई समग्र मधेशीके पहिचान, सम्मान आ संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपालक लेल नमुना स्थलके रुपमे सेहो अपन परिचय स्थापित कएने अछि । नेपालक सात प्रदेशमे पहिचानक आधारपर बनल मधेश प्रदेश मात्र अछि । एकर साख, सम्मान आ प्रतिष्ठा बचेबाक जिम्मेवारी सबगोटाके अछि । एहि वर्षक जेठ पहिल साता जनकपुरमे आयोजित तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव पर हमर ई टिप्पणी केन्द्रित अछि । एकटा लोकमैथिली साहित्यक विद्यार्थी होबाक नाता सँ हम अपन विचार पाठक समक्ष जाहेर करबाक प्रयास कए रहल छी । हमर एहि बिचार सँ सभकियो सहमत होएत से जरुरी नहि अछि मुदा मनन करबाक आवश्यक अछि ।
प्राचिन मिथिलामें स्तुतिगान करैवालाके उँच पिढिया पर बैठेबाक चलन छल, ओ अखनोधरि जारी अछि । तईँ एतह व्यक्तिके चालिसा पाठ होएत अछि । पक्षमे घडिघंट बजबैवाला बाहेक दोसरके पुछारी कमे होएत आयल अछि । घंटा बजबैवालाकेँ सम्मान कथित अभियानी सभ कहियो नहि देलक, कियक त ओ वर्चस्प पर चोट कसैत अछि । घडिघंटि डोलके बजैत अछि, मुदा घंटा तानिके वा अपना दिसि खिचके बजाओल जाएत अछि । प्रशंसाके भुखल लोक, स्तुतिगानमें आत्मरतिलिन लोकैन सभ एहि प्रराक्रममें बहुतोंकेँ भविष्यमे गदहा जनम सँ मुक्ति करबाक ध्यानमग्न रहैत छथि । जनकपुरक पिछला महोत्सवमे बहुतोंकेँ गदहा जनम छुटल होएत से हमर अनुमान मात्र अछि, सहभागी लोकैन एकर प्रत्यक्षदर्शी जरुर भेल हेताह । ई विषयकेँ प्रवुद्ध पाठक लोकैनकेँ स्वविवेक आ अनुसन्धान पर छोडि आब महोत्सवकेँ उद्देश्य पर विहंगम दृष्टिगोचर करी ।
सातम् संस्करणकेँ ई महोत्सव पिछला आयोजन सब सँ कनिको भिन्न नहि रहल अछि । जतह आयोजनक उद्देश्य भ्रमपूर्ण होइछ, ओतह निस्कर्षमे पहुँचनाए दुर्लभ होइछ । ओहूमे ४० टा स्पोन्सरके प्रचार लोगो तर रहिकेँ साहित्य, कला, संस्कृति आ भाषा जेहेन गम्भिर विषय पर भेल विमर्श विवादमुक्त आ उद्देश्य अनुरुप होएत उदाहरण कतौहू नहि भेटैत छैक । प्राचिन मिथिलामें समाज आ गाम सँ बेहरी उठाके सांस्कृतिक काज करबाक परम्परा रहलैए । अखनो बहुत रास गाम आ क्षेत्रमे एहि तरहे सांस्कृतिक कार्यक्रम सामूहिक रुप सँ आयोजन होएत आएल अछि । एहि तरहे आयोजनमे समाज आ गामक सभगोटेके अपनत्व रहैत छैक । मुदा जनकपुरधामक महोत्सव सबमे एकर अभाव सदखनि देखल गेल आ भेटैत अछि । एहि तरहे आयोजनमें स्पोन्सरके बाहेक किनको अपनत्व नहि रहि जाएत अछि । ई बात जनकपुरिया आ आयोजक संस्थाके बुझैटा पडतैन ।
‘जनकपुर साहित्य महोत्सव’केँ उद्देश्य सांस्कृतिक आ भाषिक गौरवक उन्नयन रहबाक चाही छल , से नहि भेल । महोत्सव पर सकारात्मकता सँ बेसी नकारात्मकता देखल गेल । सामाजिक संजाल आ जनमानसक प्रतिक्रिया एकर पुष्टि करैत अछि । महोत्सवके प्रमुख कमजोरी सबमे सहभागी संरचना, नाम विवाद, अमुक पार्टीके राजनीतिक वर्चस्प, जातिगत मानसिकता, आर्थिक पारदर्शिता , विवादित व्यक्तिके सहभागिता आदि देखल गेल ।
विविधतायुक्त मधेश प्रदेश आ राजधानी जनकपुरधाम रहितौहू समग्र मधेशक प्रमुख भाषाभाषीकेँ महोत्सवमे सहभागी नहि केनाए, आयोजकके पूर्वाग्रही मानसिकताकेँ पुष्टि करैत अछि । काठमाडौंसँ आयल व्यक्ति सभकेँ दबदबा आ प्राथमिकता एकर प्रमाण अछि । प्रदेशक विभिन्न भाषाभाषी–लोकमैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, महगी, जोलहा आदि के निषेध कयल गेल आरोप महोत्सवके पर्यवेक्षक सभके अछि । ओ सभ कहैत अछि जे–स्थानीय भाषाभाषी, लेखक, कलाकार आ बौद्धिक वर्ग महोत्सवमेँ उपेक्षित रहल ।
आयोजनकेँ नाम विवाद सेहो देखल गेल । ‘जनकपुर’ नाम प्रयोग करबाक कारणेँ आलोचना भेल । स्थानीय जनमानसक आग्रह रहैत अछि जे धार्मिक आ सांस्कृतिक महत्त्वक अनुरूप ‘जनकपुरधाम’ नाम प्रयोग होबाक चाही । ओकर सुधारक कोनो गुन्जाईस आयोजक नहि केलक । तहिना साहित्यिक मंचमे राजनीतिक हस्तक्षेप स्पष्ट देखल गेल । महोत्सवक विमर्श साहित्यिक विषयसँ हटि राजनीतिक वर्चस्वक प्रदर्शनमे बदलि गेल , जे पैघ दुर्भाग्य अछि ।
महोत्सवमे सहभागी लोकक चयन सीमित जाति आ पहुँचके आधार पर भेल कहि आरोप लागल । ई आरोप साहित्यिक समावेशी भावनाके कमजोर करैत अछि । जनकपुरधामके सम्पदा सूचीमे सूचिकृत करबाक लेल गेरुवावस्त्र धारण कए पैदल मार्च कएल गेल , कि एहि सँ जनकपुरधाम युनेस्कोकेँ सम्पदा सूचिमे समावेश भए जाएत ? ई कदमक औचित्य आ पारदर्शिता प्रश्नमे रहल ।
आयोजक संस्थाक एकटा कमाण्डर जनकपुर जानकी मन्दिरमे चढाओल गेल पैसाक हिसाब सार्वजनिक करबाक मांग उठौलथि । ई विषय महत्वपूर्ण होइतहू, महोत्सवके उद्देश्य अनुरुप नहि रहैक । जे संस्थामें स्वयं आर्थिक पारदर्शिताक अभाव रहलैए, ओ दोसर पर आंगूर उठाएब कतेक उचित ? एतेह कहि दि जे ई स्तम्भकार हरेक क्षेत्र, संस्था वा महोत्सव सबकें आर्थिक पारदर्शिताके पक्षधर सदखनि रहल अछि । महोत्सवके सब सँ दुःखद बात ई रहल जे विवादित व्यक्तिके हालीमुहाली देखल गेल । ब्राह्मणवादक पृष्ठपोषण करनिहार आ विवादित व्यक्तिकेँ प्रमुख भूमिकामे राखल गेल । ई महोत्सवक समावेशी छवि आ जनविश्वासमे आघात पहुँचल ।
हमरा जनितब, शायद, जनकपुर साहित्य महोत्सवक आयोजन साहित्यिक आ सांस्कृतिक उन्नयनक अपेक्षामे भेल छल, मुदा वास्तविकता मे ई आयोजन राजनीतिक वर्चस्व, जातिगत छनौट, नाम विवाद आ पारदर्शिताक अभावक कारणेँ आलोचनाक विषय बनल । स्थानीय भाषाभाषी समुदायक उपेक्षा आ जनकपुरधामक धार्मिक–सांस्कृतिक महत्त्वक अवहेलना एहि महोत्सवक मूल कमजोरी रहल ।
जनकपुरधामक सांस्कृतिक, धार्मिक आ भाषिक महत्त्वक अनुरूप भविष्यमे महोत्सवकेँ सफल, समावेशी आ विश्वसनीय बनाबय लेल सुधार आवश्यक अछि । खास ककेँ नामक शुद्धता, स्थानीय सहभागिता, समावेशी छनौट, राजनीतिक हस्तक्षेत्र निरुत्साहितता, विवादित व्यक्ति सँ दूरी कायम, सांस्कृतिक विविधता आदिकेँ जरुरी छैक ।
आयोजनक नाममे ‘जनकपुरधाम’ प्रयोग करबाक चाही, जे धार्मिक–सांस्कृतिक महत्त्वक सम्मान करैत अछि । स्थानीय भाषाभाषी, लेखक, कलाकार आ बौद्धिक वर्गकेँ प्राथमिकता दिओनाइ अनिवार्य छैक । बाहरी सहभागी सेहो रहथि, मुदा स्थानीय आवाजक उपेक्षा नहि होबाक चाही । जाति, पहुँच वा व्यक्तिगत सम्बन्धक आधार पर नहि, स्पष्ट मापदण्ड आ पारदर्शी प्रक्रिया अनुसार सहभागी चयन होबाक जरुरी अछि । साहित्यिक मंचकेँ राजनीतिक वर्चस्वसँ मुक्त राखी ।
विमर्शकेँ साहित्य, संस्कृति आ भाषा पर केन्द्रित करबाक व्यवस्था होउक । आयोजनसँ संकलित धनराशिकेँ सार्वजनिक रूपमे हिसाब दिओनाइ अनिवार्य होउक । ई विश्वसनीयता आ जनसमर्थन बढेबाकले नितान्त आवश्यक अछि । सम्पदा सूचीमे सूचिकरण लेल स्पष्ट मापदण्ड, विशेषज्ञ समिति आ सार्वजनिक परामर्श आवश्यक अछि । ब्राह्मणवादक पृष्ठपोषण करनिहार वा विवादित व्यक्तिकेँ प्रमुख भूमिकामे राखबाक परम्परा तोडि, समावेशी आ निष्पक्ष व्यक्तित्वकेँ अग्रता दिओनाइ जरुरी अछि । महोत्सवमे स्थानीय संस्कृति, लोककला, लोकगीत, चित्रकला आ नाट्यक प्रदर्शनक समावेश करबामेँ कोनो कसर नहि छोडनाए आवश्यक अछि । संक्षेपमें एकरा ई कहि सकैत छी जे–जनकपुरधाम साहित्य महोत्सवकेँ भविष्यमे सफल बनाबय लेल नामक शुद्धता, स्थानीय सहभागिता, पारदर्शिता आ समावेशी दृष्टिकोण अनिवार्य अछि । राजनीतिक वर्चस्वसँ मुक्त, सांस्कृतिक विविधता आ आर्थिक पारदर्शितासँ सम्पन्न महोत्सव जनकपुरधामक गौरव बढाबय आ स्थानीय साहित्यक उन्नयन करयमे मिलके पाथर बनौक ।
(लेखकके निजी बिचार)

Thursday, 14 May 2026

विश्वासक बीज (मैथिली लघुकथा )

न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहि, बल्कि विश्वास आ सहकार्यक फल अछि । प्रहरी आ नागरिक मिलिकेँ जखन पारदर्शिता, उत्तरदायित्व आ सहभागिताक संस्कार गढ़ैत अछि, तखन समाज अपराधमुक्त आ सभ्य बनैत अछि ।
✍ दिनेश यादव
सिम्रौनगढक ऐतिहासिक धरती पर नव भवन बनल । दू तल्ला संरचना, चमकैत रंग आ भित्तिपर टाँसल पोस्टर–गामक लोकसभक नजर खींचि लेने छल । उद्घाटनक दिन भीड़ उमड़ल । महिला, बाल–बालिका आ ज्येष्ठ नागरिकसभक मुंह पर उत्सुकता झलकैत छल ।
प्रहरी महानिरीक्षक दानबहादुर कार्की मंच पर ठाढ़ छलाह । हुनकर आवाज गंभीर मुदा आत्मीय छल । ‘तराई–मधेशमे एखनहु ‘पञ्चायती’ सोच आ ‘बिचौलियाक’ जालमे पीडÞित न्याय पाबयमे कठिनाइ झेलैत अछि,’ कार्की कहलाह । भीड़मे किछ लोक माथ हिलेलाह, मानू अपन अनुभव याद करैत ।
ओ आगू कहलाह, ‘प्रहरी कार्यालयमे समस्या राखय लेल ककरो सहारा नहि चाही । चिनजानक नाम पर रकम असुलबाक प्रवृत्ति आब सह्य नहि अछि । पीडÞितक गोपनीयता आ सुरक्षाक उच्च प्राथमिकता देल जायत ।’
गामक वृद्धा उर्मिदा देवी नजिके बैसल सुनैत छलि । हुनका लागल–शायद आब प्रहरी लग जायमे डर नहि रहत ।
‘कानूनसँ ऊपर कियो नहि, सुख–दुखमे प्रहरी साथी’–ई नाराक संग वातावरणमे नव आशा फैलि गेल । कार्की भवनक महत्त्व बतौलाह–ई केवल सरकारी संरचना नहि, नागरिकक साझा सम्पत्ति अछि । स्थानीयसभक सक्रिय सहभागिता बिना ई संरचना अधूरा रहत ।
कार्यक्रमक अन्तमे किछ व्यक्तित्वकेँ प्रशंसापत्र देल गेल । भीड़ उत्साहित भेल । मुदा सभसँ पैघ प्रशंसा नगरवासीकेँ मनमे जन्मल–प्रहरी आ नागरिकक बीच विश्वासक बीज रोपल गेल ।
ई बीज केवल शब्द नहि छल, बल्कि प्रहरी प्रमुखक आत्मस्वीकृति आ सुधारक संकल्पक प्रतीक छल । जे दिन प्रहरी स्वयं अपन कमजोरी स्वीकारि ओकरा सुधारबाक वचन दैत अछि, ओहि दिन समाजमे नव भरोसाक जन्म होइत अछि ।
शिक्षा : एहि लघुकथा सँ स्पष्ट संदेश भेटैत अछि जे न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहि, बल्कि विश्वास आ सहकार्यक फल अछि । प्रहरी आ नागरिक मिलिकेँ जखन पारदर्शिता, उत्तरदायित्व आ सहभागिताक संस्कार गढ़ैत अछि, तखन समाज अपराधमुक्त आ सभ्य बनैत अछि ।

Monday, 11 May 2026

मैथिली लघुकथा : मृत्युभोज

आत्माक शांति देखावटी भोज सँ नहि, जीवितक सेवा आ सहारा सँ होइत अछि ।
■दिनेश यादव
मनमोहना ग्वार फकिरा गामक चौरीचाँचरमें भैंस चरबैत छल । नजिक मुतनी नदीके घनघोर झाँकडिमे ओकर नजर गामक बुजुर्ग मैञ्जन जादव पर पड़ल । गामक सभ लोक हुनका ‘दादा’ कहि पुकारैत छल ।
मनमोहना नजिक गेल आ पुछलक—
‘दादा, अहाँ गाम सँ एतेक दूर मुतनी नदीके झाँकडिमे अकेले कियैक ? किछु जड़ी–बूटी चाही छल या कोनो वनस्पति आवश्यक छल तऽ हम आनि दितहुँ ।’
दादा आँखि नम करैत कहलखिन—
‘बौआ, काल्हि सँ एतहि भूखल छी । घरवला निकालि देलक । बुखार लागल छल, पाँच बेटामे सँ कोनो औषधिक लेल पैसा नहि देलक । मोन होइए जे एतैह प्राण तेज देतू । ’
चार दिनक बाद फकिरामे खबर फैलल— मैञ्जन दादा आब एहि संसारमे नहि रहलाह ।
ग्रामिण सभ गामक पोखरि महाड पर दादाके अन्त्येष्टिमे पहुँचल छल, गुमस्ता काका ओतहि दादाके पाँचो बेटाके पुछलक–
‘बौआ, मैञ्जनक भोज कतेह करबहक ? दादा बहुत धन कमाकेँ छोडि गेलौक । दू सभा मृत्युभोज त करै पडतौं । गाम समाजके चाहना एहा छयैक । ’
मैञ्जनक जेठका लडका कहलक–
‘समाज जे जेना कहतै, करबै । हम सभ भरि गाम या एक खपकटी भोज करबार सोच बनौने छियैक ।’
तेरहम दिन हुनकर बेटा सभ 10 कुन्टल बसमतिया चौरक एक सभा मृत्युभोज कएलक । सभा भोजमे रहरि दालि, डल्ना तरकारी, पापड, कुम्रौडि, परवलकेँ भुजिया सहित पाँचटा सब्जी आ सकलौडि एवं दहीचिनीकेँ भरमार व्यवस्था ककेँ सात गम्मा लोककेँ भोजन कराओल गेल ।
मनमोहना मनहि मन सोचैत छल—
‘जखन दादा जीवित छलाह तऽ औषधि उपचार नहि कएल गेल । समाज सेहों बेटा सभ सँ दादाके उपचारक खातिर कोनो पहल नहि कएलक । मुदा लाखों खर्च कऽ मृत्युभोज कएलक अछि । आत्माक शांति देखावटी भोज सँ नहि, जीवितक सेवा आ सहारा सँ होइत अछि ।’

जानकी मन्दिरक वास्तुकला आ मिथिला शैलीक प्रश्न ? (Questions about the architecture of Janaki Temple and Mithila style?)

■ दिनेश यादव
मिथिला संस्कृतिकेँ सम्मानित करबाक लेल वास्तुकला आ सांस्कृतिक प्रभावक बीच स्पष्ट भेद बुझब आवश्यक अछि । मिथिला शैलीक वास्तुकलाकेँ ऐतिहासिक रूप सँ सही परिभाषित करब आ जानकी मन्दिरक वास्तविक मिश्रित शैलीकेँ स्वीकार करब, ई सांस्कृतिक ईमानदारीक प्रतीक अछि ।
मन्दिरक वास्तुकलाकेँ जानकारी अभावमे किछु ‘मिथिला शैली’ कहि प्रचार करैत छथि । नेपालक एकटा राष्ट्रिय दैनिकमे प्रकाशित आलेखमे सेहो ओहे गल्ति दोहराओल गेल अछि । ऐतिहासिक दृष्टिकोण सँ ई विश्लेषण शुद्ध नहि अछि । वास्तुकला विशेषज्ञ आ ऐतिहासिक दस्तावेजक आधार पर ई मन्दिरक निर्माण हिन्दु-राजपूत, मुगल आ राजस्थानी शैलीक मिश्रण अछि ।
प्रमुख वास्तुकला शैलीक तत्व
●हिन्दु-राजपूत शैली: भव्य गुम्बज, विस्तृत आँगन, सजावटी झाल।
●मुगल शैली: रंगीन काँचक प्रयोग, गुम्बजक सौन्दर्य ।
●राजस्थानी शैली: झरोखा (ओभरह्याङ्गिङ बाल्कनी), कलात्मक स्तम्भ ।
ई मिश्रणक कारणे मन्दिरक रूप भव्य आ अद्वितीय बनल अछि ।
परम्परागत मिथिला वास्तुकला माटि, काठ आ स्थानीय कलात्मक ढाँचामे आधारित रहैत अछि । छोट-छोट घर, आँगनक चारिपटि सजावट आ स्थानीय सामग्रीक प्रयोग मिथिला शैलीक मूल विशेषता अछि । जानकी मन्दिरमे ई ढाँचा मूल रूप सँ नहि भेटैत अछि । ऐतिहासिक ‘मुरली चौक’ केँ ‘विद्यापति चौक’ नामकरण करबाक तर्ज पर जानकी मन्दिरके मिथिला शैली कहि देनाई अनुचित अछि।
यद्यपि वास्तुकला दृष्टि सँ ई मन्दिर मिथिला शैलीक उदाहरण नहि अछि, मुदा सांस्कृतिक दृष्टि सँ ई मन्दिर मिथिला क्षेत्रक गहिरा प्रभाव सँ भरल अछि । मन्दिरक भित्तिमे मधुबनी चित्रकला आ मिथिला प्रतीकक प्रयोगके मिथिला शैली कहि देनाई ईतिहासके साथ भद्दा मजाक बाहेक आओर किछु नहि भए सकैत अछि । अन्नपूर्ण पोष्टके आलेखमे ‘जनकपुरधामक ईतिहास’ पुस्तकके हावाला दैत उल्लेख कएल गेल ‘माछक सन्दर्भ’ जानकी मन्दिरके मिथिला शैली होबाक पुष्टि नहि अछि ।
अहि आधार पर जानकी मन्दिरक वास्तुकला केँ "मिथिला शैली" कहल ऐतिहासिक दृष्टि सँ गलत अछि । फेर कहैत छी जे ई मन्दिर हिन्दु-राजपूत, मुगल आ राजस्थानी शैलीक मिश्रण अछि । तथापि, मधुबनी चित्रकला आ सांस्कृतिक प्रतीकक कारणे ई मन्दिर मिथिला संस्कृति सँ गहिरा रूपेँ प्रभावित अछि ।अतः उचित परिभाषा ई होयत—'जानकी मन्दिर मिथिला संस्कृति सँ प्रभावित, मुदा वास्तुकला दृष्टि सँ हिन्दु-राजपूत, मुगल आ राजस्थानी शैलीक मिश्रण अछि।'
अन्तमे, मिथिला संस्कृतिकेँ सम्मानित करबाक लेल वास्तुकला आ सांस्कृतिक प्रभावक बीच स्पष्ट भेद बुझब आवश्यक अछि । मिथिला शैलीक वास्तुकलाकेँ ऐतिहासिक रूप सँ सही परिभाषित करब आ जानकी मन्दिरक वास्तविक मिश्रित शैलीकेँ स्वीकार करब, ई सांस्कृतिक ईमानदारीक प्रतीक अछि । ##दिनेश_यादव##

Thursday, 7 May 2026

मैथिली भाषा : पृष्ठ एक, शैली अनेक (2) (Maithili Language: One Page, Many Styles)

भाषाक विद्यार्थीक लेल ‘कन्फ्युजन’, व्याकरणीय शैलीमे कून सही ?
गोरखापत्रमें मैथिली भाषामे प्रकाशित पृष्ठमे बारम्बार दोहराओल गेल अक्षम्य त्रुटिसँ भाषाक विद्यार्थी लोकनिके ‘कन्फ्युजन’ उत्पन्न करैत अछि । व्याकरणीय शैलीमे कून रुप सही अछि, दोधार सेहो उत्पन्न होएत आएल अछि । २०८३ वैशाख २ गते प्रकाशित पृष्ठमे ओहे पुरनके त्रुटि सबके पुनारावृत्ति भेल अछि । एकर सुधार कोनाके होएत ? जिम्मेवार के ? गोरखापत्र किंवा पृष्ठक सम्पादक/संयोजक ?
एहि पृष्ठमे पुनरार्वत्ति भेल त्रुटि सब एतेह उल्लेख अछि । पृष्ठ एक, शैली अनेकसँ मैथिली भाषा सिकैवालाके लेल समस्या सृर्जित करैत अछि । एहिमे सुधार अपरिहार्य छैक, नै त एहि पृष्ठके बन्द कराओल जाए । पृष्ठमे कतौहू ‘सँ’ के जोडल गेल अछि, कतौहू अलग कएल गेल अछि । कतौहू ‘सँगहि’ आ कतौहू ‘संगहि’, कतौहू देवनागरीमे लिखल संख्याके जोडल गेल अछि, कतौहू अलग राखल अछि (उदाहरण : दूगोट, पाँच गोट) , एहिमे कून सहि अछि ? लेखनमे एकरुपता आवश्यक छैक । गोरखापत्र मानक मानल जाएछ, जौ मानक पत्रिकामे फराक–फराक शैली होएत त विद्यार्थी आ पाठकक लेल ‘कन्फ्युजन’ मे राखब बाहेक आउर किछु नहि भए सकैत अछि । ‘डाँ.’ या ‘डा.’ ठीक ? सामान्यता अनुस्वार , विसर्ग वा अन्य चिन्ह संक्षिप्त रुपमे रखबाक प्रचलन नहि छैक । प्रकाशित पृष्ठमे अनुस्वार संगहि बिंदू सेहो राखल गेल अछि (उदाहरण: डाँ.), जे गलत अछि , होबाक चाही ‘डा.’ । एतेह स्मरणीय विषय अछि जे लेखनमे कून भाषा शैली (हिन्दी किंवा नेपाली) के प्रयोग कएल जाए, एकर निश्चितता वा निर्धारण जरुरी छैक । एकैहि पृष्ठमे दू भाषाक शैली अनुचित अछि । भाषा शैलीमे एकरुपता अनिवार्य आ अपरिहार्य होबाक चाही।
गोरखापत्रके मैथिली पृष्ठमे एकैहि लेखकद्वारा दूगोट शैली हस्यास्पद थिक, एहिमे सुधार जरुरी अछि । आगन्तुक शब्द सबके ‘कोट इन कोट’ किंवा ‘इटालिक’ वा ‘बोल्ड’ करबाक चाही । एहन अवस्थामे सामान्यतय ‘कोट इन कोट’ (‘ ’) राखल जाएछ । तहिना मैथिली भाषामे ‘सब’ निर्जिवके लेल आ ‘सभ’ जीवित संज्ञाके लेल लेखल जेबाक प्रचलन भेटैत अछि । प्रस्तुत् पृष्ठमे एहि शैलीके नजरअन्दाज कएल जेल अछि ।
पृष्ठमे कतौहू ‘के’, कतौहू ‘केँ’ लिखल अछि, कतौहू जोडल त कतौह अलग अछि । तहिना ‘मे’ कतौहू जोडल त कतौह अलग अछि । ‘एहि’ वा ‘एही’ दू गोट शैली पृष्ठमे भेटैत अछि । ‘लोकसाहित्यक अध्ययन’ शीर्षकके आलेखमे लेखक स्वयं अपन नाम आ पोथी उल्लेख कएने छथि , एहि तरहे प्रस्तुति कतौहू नहि भेटैत अछि । एतह लेखक अपन नामके पुनरावृत्ति नहि ककें ‘ई स्तम्भकार’ किंवा ‘एहि आलेखके लेखक’ जेहन शैलीके प्रयोग करबाक चाही छल ।
गोरखापत्र मैथिली पृष्ठ मानक मानल जाएछ । यदि ओतहि फराक–फराक शैली प्रयोग होएत अछि, त पाठक आ विद्यार्थी भ्रमित होएत अछि । एहिमे सुधारक जिम्मेवारी सम्पादक/संयोजकके होएत अछि । एकरुपता सुनिश्चित करब, मानक व्याकरणीय नियम पालन करब, आ त्रुटि पुनरावृत्ति रोकब जरुरी अछि । मैथिली भाषाक पृष्ठमे एकरुपता अनिवार्य छैक ।
किछु उदाहरणीय मुख्य बिन्दु
1. संक्षिप्त रूप (अभिव्यक्ति)
o मानक नियम: पहिलो अक्षर + आवश्यक ध्वनि + पूर्णविराम
o उदाहरण: डॉक्टर → डा.
o अनुस्वार वा अन्य चिह्न ( डाँ.) संक्षिप्त रूपमे प्रयोग गलत ।
2.‘सँ’ प्रयोग
o मैथिलीमे ‘सँ’ पृथक राखब मानक मानल जाएछ ।
o उदाहरण: सुरक्षा सँ सम्बन्धित (सही) ।
o जोडिके लिखल (सँ) अस्वाभाविक आ कम प्रचलित ।
3. ‘संगहि’ बनाम ‘सँगहि’
o मैथिलीमे ‘संगहि’ नैसर्गिक रूप; ‘सँगहि’ नेपाली शैलीक प्रभाव ।
o एकरुपता लेल ‘संगहि’ प्रयोग करब उचित ।
4. संख्या लेखन
o देवनागरी संख्याके अलग राखब मानक: दू गोट, पाँच गोट ।
o जोडिके लिखल (दूगोट) अस्वाभाविक ।
5. ‘सब’ बनाम ‘सभ’
o निर्जीव वस्तु लेल → सब
o जीवित प्राणी लेल → सभ
o उदाहरण: पुस्तक सब (सही), विद्यार्थी सभ (सही)।
6. आगन्तुक शब्द
o सामान्यत: ‘कोट इन कोट’ (‘ ’) प्रयोग करब मानक।
o वैकल्पिक रूपेँ इटालिक वा बोल्ड सेहो प्रयोग भ’ सकैत अछि, मुदा एकरुपता जरुरी।
✍ जिम्मेवार
गोरखापत्र मैथिली पृष्ठ मानक मानल जाएछ। यदि ओतहि फराक–फराक शैली प्रयोग होएत अछि, त पाठक आ विद्यार्थी भ्रमित होएत अछि ।
सुधार जिम्मेवारी:
सम्पादक/संयोजकके होएत अछि ।
उपाय:
एकरुपता सुनिश्चित करब, मानक व्याकरणीय नियम पालन करब, आ त्रुटि पुनरावृत्ति रोकब ।

Sunday, 11 January 2026

मर्यादा र गोपनीयता

"एक-अर्कालाई एकान्तमा सच्याउनुहोस्, तर सार्वजनिक रूपमा एक-अर्काको बचाउ गर्नुहोस् ।"
यो चित्रले स्वस्थ र बलियो सम्बन्धको एउटा निकै महत्त्वपूर्ण आधारलाई प्रस्तुत गरेको छ । यसको मुख्य सन्देश 'एकता र आपसी सम्मान' हो । चित्रको मुख्य अर्थ: "मर्यादा र गोपनीयता" अर्थात् "एक-अर्कालाई एकान्तमा सच्याउनुहोस्, तर सार्वजनिक रूपमा एक-अर्काको बचाउ गर्नुहोस्।"
यसको अर्थ हो—हामी कोही पनि पूर्ण हुँदैनौँ, गल्ती सबैबाट हुन्छ। तर त्यो गल्तीलाई कसरी र कहाँ औँल्याइन्छ भन्ने कुराले सम्बन्धको आयु तय गर्छ । एकान्तमा सच्याउनु भनेको एक-अर्काप्रतिको इमानदारी र सुधार गर्ने चाहनालाई प्रदर्शन गर्नु हो । त्यस्तै सार्वजनिक रूपमा बचाउ गर्नु भनेको अरूको अगाडि आफ्नो साथी वा पार्टनरको मान-मर्यादा जोगाउने "एकजुटता" (Unity) लाई प्रर्दशन गर्नु हो ।
१.कुर्सी नै किन ?
यो चित्रमा कुर्सी को प्रयोग गर्नुको पछाडि निकै गहिरो र प्रतीकात्मक (Symbolic) कारणहरू छन् । केवल मानिसको चित्र राख्नु भन्दा कुर्सी राख्नुले सन्देशलाई अझ व्यापक बनाउँछ:
१.१ संवाद र छलफलको प्रतिक (Dialogue and Conversation):- कुर्सीहरू प्रायः संवादका लागि प्रयोग गरिन्छन्। दुईवटा कुर्सी एक-अर्काको आमने-सामने हुनुको अर्थ हो—"यहाँ कुराकानी भइरहेको छ।" यसले "एकान्तमा सच्याउने" (Correcting in private) प्रक्रियालाई झल्काउँछ, जहाँ दुई व्यक्ति बसेर शान्तपूर्वक छलफल गर्छन् ।
१.२ पद, मर्यादा र स्थान (Position & Dignity):- समाजमा कुर्सीलाई 'पद' वा 'मर्यादा' को प्रतीक मानिन्छ। जब हामी अरूको अगाडि आफ्नो साथीको रक्षा गर्छौँ, हामी वास्तवमा उसको "कुर्सी" (अर्थात् उसको इज्जत र स्थान) जोगाइरहेका हुन्छौं । कुर्सी खाली हुनुको अर्थ यो पनि हुन सक्छ कि यो कुनै खास व्यक्तिको लागि मात्र नभई, जो कोही (श्रीमान-श्रीमती, साथी, वा सहकर्मी) का लागि पनि लागू हुन्छ ।
१.३ समानता (Equality):- चित्रमा दुवै कुर्सीहरू एउटै आकार र उचाइका छन् । यसले सम्बन्धमा समानता देखाउँछ। एक-अर्कालाई सच्याउने हक दुवैलाई छ र एक-अर्काको सम्मान जोगाउने जिम्मेवारी पनि दुवैको बराबर छ भन्ने यसले बुझाउँछ ।
१.४ स्थिरता र आराम (Stability & Comfort)- कुर्सीले स्थिरताको प्रतिनिधित्व गर्छ। एउटा बलियो सम्बन्ध त्यही हो जहाँ व्यक्तिले आफू सुरक्षित र स्थिर महसुस गर्छ। "निजीमा सच्याउने र सार्वजनिकमा बचाउने" व्यवहारले सम्बन्धलाई त्यही स्थिरता (Stability) प्रदान गर्छ।
१.५'अदृश्य' उपस्थिति (Invisible Presence)- कहिलेकाहीँ वस्तुहरू (जस्तै कुर्सी) मात्र देखाउँदा सन्देश बढी प्रभावशाली हुन्छ। यसले दर्शकलाई आफैँ कल्पना गर्न दिन्छ। ती कुर्सीहरूमा जो पनि हुन सक्छ—तपाईँ र तपाईँको साथी, वा तपाईँ र तपाईँको जीवनसाथी। यसले यो नियमलाई "विश्वव्यापी नियम" को रूपमा प्रस्तुत गर्दछ।
संक्षेपमा भन्नुपर्दा: यी कुर्सीहरूले "सुरक्षित ठाउँ" (Safe Space) लाई जनाउँछन्। यस्तो ठाउँ जहाँ हामी आफ्ना कमजोरीहरूमाथि छलफल गर्न सक्छौँ (निजीमा) र जहाँबाट बाहिर निस्कँदा हामी एक ढिक्का भएर निस्कन्छौँ (सार्वजनिकमा)।
२.कुर्सीको सिद्धान्त :
यो विचार वा धारणा कुनै एउटै विशिष्ट व्यक्ति वा एउटै मात्र पुस्तकबाट आएको भन्दा पनि यो सामाजिक मनोविज्ञान (Social Psychology) र नेतृत्व विकास (Leadership) को क्षेत्रमा एउटा साझा सिद्धान्तको रूपमा प्रचलित छ । यद्यपि, यसलाई विभिन्न क्षेत्रमा फरक-फरक व्यक्ति र सन्दर्भसँग जोडेर हेर्ने गरिन्छ:
२.१ नेतृत्वको सिद्धान्त (Leadership Principle):- व्यवस्थापनको क्षेत्रमा यो धारणालाई "Praise in Public, Correct in Private" (सार्वजनिक रूपमा प्रशंसा गर्नुहोस्, एकान्तमा सच्याउनुहोस्) भनिन्छ । यो भनाइ प्रायः भिन्स लोम्बार्डी (Vince Lombardi) सँग जोडिन्छ, जो एक प्रसिद्ध अमेरिकी फुटबल कोच थिए। उनले आफ्ना खेलाडीहरूको मनोबल उच्च राख्न यो नियम पालना गर्थे । आधुनिक व्यवस्थापनमा केन ब्लान्चर्ड (Ken Blanchard) ले आफ्नो प्रसिद्ध पुस्तक "The One Minute Manager" मा पनि यस्तै खालको पृष्ठपोषण (Feedback) दिने तरिकाबारे चर्चा गरेका छन् ।
२.२ कुटनीतिक र सैन्य सन्दर्भ (Diplomatic & Military Context):- सेना र कुटनीतिमा एउटा पुरानो मान्यता छ: "हाम्रो मतभेद घरभित्रै सुल्झाउनुपर्छ, शत्रु वा बाहिरी संसारको अगाडि हामी सधैँ एक हुनुपर्छ।" यो धारणा धेरै देशका सैन्य आचारसंहिता (Code of Conduct) को हिस्सा बनेको छ।
२.३ धार्मिक र सांस्कृतिक स्रोत:- धेरै संस्कृति र धर्महरूमा पनि यसको जरा भेटिन्छ: -इस्लाम धर्म: यसमा 'नसिहा' (परामर्श) को अवधारणा छ, जसमा अरूलाई सच्याउँदा उसको इज्जत नजाओस् भनेर एकान्तमा सम्झाउनु पर्ने कुरामा जोड दिइन्छ । बौद्ध दर्शन: यसले "सत्य र प्रिय वचन" को कुरा गर्छ, जसले अरूको मानमर्दन नगरी सुधार ल्याउन सिकाउँछ।
२.४ डिजिटल आर्ट र आधुनिक भनाइ (Internet/Modern Quote):- यो विशिष्ट चित्र र भनाइ भने हालैका वर्षहरूमा इन्टरनेट र सामाजिक सञ्जाल (जस्तै Pinterest वा Instagram) मा निकै लोकप्रिय भएको हो। यसलाई कसैले 'Relationship Goals' वा 'True Loyalty' को रूपमा साझा गर्ने गर्छन्। यसको कुनै एक निश्चित लेखक नभए पनि, यो "Loyalty" (बफादारी) को विश्वव्यापी सिद्धान्त हो ।

Thursday, 11 December 2025

जनकपुरधामक इतिहास लेखनमे प्रमाणिकता आ चुनौती (Authenticity and Challenges in Writing the History of Janakpur Dham)

–दिनेश यादव
उपेन्द्र नागवंशीक समीक्षा कठोर भेलाक बाद ई आवश्यक छल । एहि समीक्षा सँ जनकपुरधामक इतिहास लेखनमे भेल त्रुटि उजागर भेल आ भविष्यमे प्रमाणिक, खोजमूलक आ व्यवस्थित इतिहास लेखनक आवश्यकता स्पष्ट भेल। शशिक पुस्तक आधुनिक जनकपुरधामक सामाजिक–राजनीतिक आयाम केँ जीवन्त बनबैत अछि, मुदा प्राचीन मिथिला–विदेह–तिरहुतक इतिहासमे ठोस साक्ष्यक अभाव आ तथ्याङ्कीय त्रुटि पुस्तक केँ कमजोर बनबैत अछि । जनकपुरधामक इतिहास लेखन आब अनुमान आ किवदन्तीमे सीमित नहि रहि, प्रमाणिक अनुसन्धान पर आधारित होबाक चाही ।
विदेह–मिथिला–तिरहुत क्षेत्रक ऐतिहासिक महत्व अत्यन्त गहिरगर अछि । एहि भूभागक सांस्कृतिक, धार्मिक आ सामाजिक योगदान दक्षिण एशियाक सभ्यताक विकासमे विशेष स्थान रखैत अछि । मुदा एहि क्षेत्रक प्रमाणिक इतिहास लेखनमे आजुक दिन धरि ठोस साक्ष्यक अभाव देखाइत अछि । प्राचीन मिथिला वा जनकपुरधामक इतिहास लेखनमे श्रुति, ब्राह्मणवादी साहित्य आ किवदन्तीक प्रभाव हावी रहल अछि, जे तथ्यपरक अनुसन्धान केँ कमजोर करैत अछि ।
शशिक पुस्तक आ नागवंशीक समीक्षा:
श्यामसुन्दर शशिद्वारा लिखित जनकपुरधामके इतिहास जनकपुरधामक ऐतिहासिक आयाम केँ समेटबाक प्रयास अछि । प्रयास प्रशंसनीय अछि, मुदा पत्रकार उपेन्द्र नागवंशी जनकपुर टुडेक विचार पृष्ठमे प्रकाशित समीक्षा मे पुस्तकक विभिन्न कमजोरी उजागर कएलनि ।
तथ्याङ्कीय त्रुटि आ विरोधाभासः
जनक वंशक कालावधि (३००–६०० ई.पू. बनाम ७२५ ई.पू.) मे असंगति ।
महाभारत युद्धक समय ई.पू. ९५० उल्लेख, जे ऐतिहासिक दृष्टि सँ असंगत ।
नगर पञ्चायत गठन वर्ष (२०१६ बनाम २०१७) आ रेल्वे सञ्चालन वर्ष (१९८२ बनाम १९९२) मे विरोधाभास ।
शैलीगत कमजोरी :
पत्रकारितामुखी भाषा प्रयोग सँ इतिहास भ्रमित भेल अछि ।
पहिल भागक प्रसंग दोसर भागमे पुनः दोहरायल ।
जनकपुर उपमहानगरपालिकाक प्राचीन स्थलसभक इतिहास पर्याप्त रूपेँ समाविष्ट नहि भेल ।
प्रमाणिक इतिहास लेखनक आवश्यकता:
नागवंशीक टिप्पणी अनुसार, पुरातात्त्विक उत्खनन, अभिलेखीय अध्ययन, मौखिक परम्पराक व्यवस्थित संकलन आ प्रमाणिक स्रोतक पुष्टि बिना लिखल इतिहास अमूर्त भऽ जाइत अछि । कालक्रम, वर्ष, वंशावली आ घटनाक्रम केँ प्रमाणिक स्रोत सँ पुष्टि नगरी प्रस्तुत करब पाठकप्रति अन्याय अछि ।
भविष्यक लेल सुझाव:
विश्वविद्यालय, अनुसन्धान संस्था आ स्थानीय निकाय सँ सहकार्य कए प्रमाणिक इतिहास लेखन केँ प्रोत्साहन देब जरुरी अछि । तथ्याङ्कीय त्रुटि केँ सुधार करतै आगामी संस्करण केँ व्यवस्थित बनाबक आवश्यक अछि । पत्रकारितामुखी शैली सँ अलग, सरल आ खोजमूलक इतिहास लेखन शैली अपनाबक सेहो जरुरी अछि । प्राचीन स्थलसबके इतिहास केँ पर्याप्त रूपेँ समाविष्ट करब अति आवश्यक अछि ।
उपेन्द्र नागवंशीक समीक्षा कठोर भेलाक बाद ई आवश्यक छल । एहि समीक्षा सँ जनकपुरधामक इतिहास लेखनमे भेल त्रुटि उजागर भेल आ भविष्यमे प्रमाणिक, खोजमूलक आ व्यवस्थित इतिहास लेखनक आवश्यकता स्पष्ट भेल। शशिक पुस्तक आधुनिक जनकपुरधामक सामाजिक–राजनीतिक आयाम केँ जीवन्त बनबैत अछि, मुदा प्राचीन मिथिला–विदेह–तिरहुतक इतिहासमे ठोस साक्ष्यक अभाव आ तथ्याङ्कीय त्रुटि पुस्तक केँ कमजोर बनबैत अछि । जनकपुरधामक इतिहास लेखन आब अनुमान आ किवदन्तीमे सीमित नहि रहि, प्रमाणिक अनुसन्धान पर आधारित होबाक चाही । एहिके लेल मिथिला–विदेह–तिरहुत क्षेत्रक गौरवशाली इतिहास केँ विश्वसामु विश्वसनीय रूपेँ प्रस्तुत कएल जा सकैत अछि ।

Tuesday, 21 October 2025

'हुक्कापाती' वा 'हुक्कालोली' : प्रकृतिको वरदान र समृद्धिको आह्वान

नेपालको मधेश क्षेत्रमा दीपावली (लक्ष्मी पूजा) को अवसरमा एउटा विशिष्ट परम्पराले घर-आँगनलाई सुशोभित गर्छ। यो हो - जुटको डाँठ (संठी) वा रारी (खर/झार) बाट बनाइएको एक विशेष आकृतिलाई घरको छाना वा छतमा राख्ने चलन, जसलाई स्थानीय भाषामा कतै 'हुक्कापाती' त कतै 'हुक्कालोली' भनेर चिनिन्छ। मधेश क्षेत्रको एक विशिष्ट एवं मौलिक परम्परा, जसले प्रकृति र अध्यात्मलाई जोड्छ।
यो आकृति हेर्दा सरल देखिए पनि, यसले हजारौं वर्षदेखि चलिआएको सांस्कृतिक, सामाजिक र धार्मिक विश्वासको धरातल बोकेको छ। खासगरी सनपाट (जूट) कै रेसाले बाँधेर प्राकृतिक वस्तुको प्रयोग गरी बनाइने यस परम्पराले आधुनिक समयमा पनि आफ्नो महत्व कायमै राखेको छ।
दिनेश यादव
'हुक्कापाती' वा 'हुक्कालोली' पूर्ण रूपमा प्राकृतिक सामग्री—जुटको डाँठ, खर र जुटको रेसाबाट बनाइन्छ । यो परम्पराले मानिस र प्रकृतिबीचको गहिरो सम्बन्धलाई दर्शाउँछ । यसले हामीलाई सिकाउँछ कि हाम्रो सुख र समृद्धि प्राकृतिक स्रोतहरूको दिगो उपयोग र संरक्षणमा निर्भर गर्दछ । यो प्रकृतिको सम्मान गर्ने एउटा सुन्दर माध्यम हो । यस प्रकारका हस्तकलाहरू प्राय: परिवारका सदस्यहरू मिलेर बनाउँछन् । यसले पुस्तान्तरणको ज्ञान र सीपलाई जोगाउँछ र परिवार तथा समुदायबीचको सहकार्य र सामूहिकताको भावनालाई प्रवर्द्धन गर्दछ ।
दीपावलीको मुख्य पर्व नै धन, ऐश्वर्य र समृद्धिकी देवी लक्ष्मीको पूजा हो । यो 'हुक्कापाती'लाई घरको सबैभन्दा माथिल्लो भाग (छाना/छत) मा राख्दा, यो एक प्रकारले देवी लक्ष्मीलाई घरमा स्वागत गर्नको लागि तयार पारिएको 'उच्च आसन' वा 'ध्वजा' को रूपमा लिइन्छ ।
जुटको डाँठ र खर जस्ता वस्तुलाई धार्मिक अनुष्ठानहरूमा पवित्र मानिन्छ। यी वस्तुको संयोजनबाट बनेको 'हुक्कापाती' ले घरको वातावरणमा सकारात्मक ऊर्जाको प्रवाह गर्ने, दुष्ट आत्मा वा नकरात्मक शक्तिलाई टाढा राख्ने र घरलाई शुद्ध बनाउने धार्मिक विश्वास छ। परापूर्वकालदेखि यो विश्वास चल्दै आएको छ कि 'हुक्कापाती' ले घरलाई विभिन्न प्राकृतिक विपत्तिबाट बचाउँछ । यसलाई छतमा राख्दा देवी-देवताको कृपाले घर आगलागी, हुरी-बतास वा चट्याङ जस्ता प्रकोपबाट सुरक्षित रहन्छ भन्ने जनविश्वास छ । यो परम्परा केवल भौतिक सुरक्षाका लागि मात्र होइन । यो परिवारमा सुख, शान्ति, आरोग्य र दिगो समृद्धि भित्र्याउने कामनाको प्रतीक पनि हो । यसलाई वर्षभरि घरमा धन, अन्न र खुसीको भण्डार भरिरहोस् भन्ने प्रार्थनाका रूपमा लिइन्छ ।
दीपावलीको उज्यालोमा छतमा राखिएको यो सरल आकृतिले पर्यावरण मैत्री जीवनशैली, पारिवारिक सद्भाव र अटूट धार्मिक आस्थाको सन्देश दिन्छ । यो परम्परा हामी सबैका लागि एउटा प्रेरणा हो, जसले सुख, शान्ति र समृद्धिको कामना गर्दै प्रकृतिसँग एकाकार भएर बाँच्न सिकाउँछ । यो परम्परा केवल घर सजाउने माध्यम मात्र नभई, यो प्रकृति, भक्ति, र सामुहिक उत्सवको एक गहिरो अनुष्ठान हो । यो 'हुक्कापाती' महिनौंसम्म छतमा रहन्छ, जसले वर्षभरि घरलाई दैवी सुरक्षा प्रदान गरोस् भन्ने कामना गर्दछ ।
लक्ष्मी पूजाको साँझ, परिवारका ज्येष्ठ नागरिक वा घरमूलीले विशेष ठूलो आकारको हुक्कापाती (हुक्कालोली) तयार पार्छन् । यसमा आगो बालिन्छ । आगो बालिएको हुक्कालोलीलाई अत्यन्तै श्रद्धाभावका साथ पहिले गृह देउता घर (गोसाईं घर/कुलदेवताको स्थान) मा देखाइन्छ । त्यसपछि त्यो प्रज्वलित हुक्कालोलीलाई घरको प्रत्येक कोठा, भण्डार कक्ष र गाई-बस्तु राखिने गोठ सम्म परिक्रमा गराइन्छ । यो परिक्रमाका क्रममा घरमूलीले भक्तिभावका साथ देवी लक्ष्मीसँग आर्शिवाद माग्दै 'भत्याउने' (स्तुति गर्ने) गर्छन्। उनीहरूको कामना यस्तो हुन्छ:
'घरमा सुख, शान्ति, समृद्धि कायम होस् ।
काल-कष्ट, दु:ख-पीडा हरण होस् ।
कसैकै नजर-गुजर (नकारात्मक दृष्टि) नलागोस्।'
यो अनुष्ठानले भौतिक सम्पत्तिसँगै पारिवारिक स्वास्थ्य, सुरक्षा र मानसिक शान्ति को कामना गर्दछ । यसले घरलाई बाहिरी नकरात्मक शक्ति र दुष्ट नजरबाट जोगाउने एउटा दैवी सुरक्षा घेरा निर्माण गर्छ भन्ने विश्वास छ ।
गृह अनुष्ठान सम्पन्न भएपछि, बालबालिका, केटाकेटी र किशोरकिशोरीहरू एकत्रित भई सार्वजनिक र खुला स्थानमा सामूहिक रूपमा 'हुक्कापाती खेल्ने' चलन सुरु हुन्छ । यो खेलको क्रममा 'हुकापाती शुरू रहे' भन्दै सामूहिक उद्घोष गरिन्छ । यो उद्घोष आफैँमा एक प्रकारको सांस्कृतिक अनुष्ठान हो, जसले उल्लास र ऊर्जाको प्रवाह गर्दछ । नजिकै थरी-थरीका पाटाका पड्काउने र आतिसवाजी (पटाका) गर्ने गरिन्छ, जसले दीपावलीको रौनकतालाई पराकाष्ठामा पुर्‍याउँछ । हुक्कापातीको आगो र पटाकाको प्रकाशले समाजमा नयाँ उमङ्ग र उत्साहको सञ्चार गर्दछ ।
अन्त्यमा, मधेशको ‘हुक्कापाती’ परम्परा केवल दीपावलीको एउटा अनुष्ठान मात्र नभई, यो प्रकृति, भक्ति र सामूहिक जीवनशैलीको एउटा जीवन्त पाठ हो । यसले हामीलाई वास्तविक समृद्धि तब प्राप्त हुन्छ, जब हामी प्रकृतिलाई सम्मान गछौं, हाम्रो घरलाई ऊर्जावान राख्छौं र सबैभन्दा महत्वपूर्ण कुरा, परिवार तथा समुदायमा सुख–शान्ति कायम गर्न सामूहिक रुपमा कामना गर्छौ । सरल जूटको डाँठले बोकेको यो गहिरो अर्थ आजको युगमा पनि उत्तिकै महत्वपूर्ण र प्रेरणादायी छ ।

Sunday, 28 September 2025

नेपालक संदर्भमे 'सर' के स्त्रीलिङ्ग 'सराइन' कतेक उचित वा अनुचित ?

मैथिली भाषाके चर्चित लेखक,साहित्यकार एवं विद्वान प्रा.परमेश्वर कापडी अपन फेसबुक स्टेटसमे 'सर'शब्दक स्त्रीलिङ्ग 'सराइन' लिखने छथि । मैथिलीमे हुनक अही शब्दक प्रस्ताव नेपालीय मैथिली संदर्भमे व्यापक आ फराक अनुमोदन अपेक्षित अछि । मुदा अखुनका परिवेशमे अहि तरहे शब्द 'लैङ्गिक विभेदजन्य'अछि। पहिने हुनकर स्टेटस देखल जाए, ओ लिखैत छथि -
"हमरो घरमे मैथिलीक बड़ मान । क्याम्पसमे अदहास' अधिक अङरेजिए शब्दके बाजि, प्राज्ञिकता झारत । त' ओहि हिसाबे हम 'सर'! सब सरे कहि सम्बोधैत अछि । आब 'सर' के स्त्रीलिङ्ग भेल 'सराइन'! तैं ई हमर सराइन, हमर घरनी! जेना-- मास्टरके स्त्रीलिङ्ग मास्टरनी.। तहिना डागडरके डागडरनी, सिंहके सिंहनी!...."
प्रा.कापडीके ई शब्दक चयन वा अविष्कार वा प्रस्ताव कून भूगोलक लेल ( प्राचीन मिथिला वा विभाजित मिथिला ?) अछि ? से नहि जाइन । मुदा नेपालक संदर्भमे अनुचित अछि ! विशेष रूपसँ नेपालक राष्ट्र भाषा आ सामाजिक प्रयोगके संदर्भमे, लिंग-आधारित शब्द-रचनाक प्रति संवेदनशीलता बढ़लछ, कियाकि लैंगिक विभेद (gender discrimination) कम करबाक लेल लिंग-निरपेक्ष (gender-neutral) शब्दक प्रयोग प्रोत्साहित कएल जाइछ । किछु शब्द जे परंपरागत रूपसँ पुरुष वा स्त्री लिंगक लेल अलग-अलग प्रयोग होइत छल, आब लिंग-निरपेक्ष रूपमे एकरूपताक प्रयास आ व्यवहारमे सेहो देखल गेल अछि । उदाहरण स्वरूप, 'शिक्षक' (पुरुष) आ 'शिक्षिका' (स्त्री)क बदला केवल 'शिक्षक'क प्रयोग सर्वलैंगिक रूपमे कएल जाइछ , जे लैंगिक समानताक पक्षमे एक महत्वपूर्ण कदम मानल जाइतछ।
नेपालमे लिंग-निरपेक्ष शब्दक प्रयोग आ उदाहरण
नेपालमे, विशेष रूपसँ औपचारिक, शैक्षिक आ सरकारी संदर्भमे, लिंग-आधारित शब्दक प्रयोग कम करबाक लेल नीति आ सामाजिक जागरूकता बढ़लछ । निम्नलिखित उदाहरण एकर स्पष्टता दैतछ:
1. शिक्षक/शिक्षिका:
-पहिलेक प्रयोग: 'शिक्षक' पुरुष शिक्षकक लेल, आ 'शिक्षिका' स्त्री शिक्षकक लेल ।
-आधुनिक प्रयोग: आब 'शिक्षक' लिंग-निरपेक्ष रूपमे प्रयोग होइत छै। उदाहरण:
- "रमिता शिक्षक छथि" (स्त्री शिक्षकक लेल सेहो 'शिक्षक')।
- कारण: 'शिक्षिका'क प्रयोग लिंग-आधारित भेदभावक संकेत दै सकैत छै, तें एकर प्रयोग कम कएल जा रहल छै।
- वर्जित: 'शिक्षिका' लिखनाय वा बोलनाय औपचारिक दस्तावेजमे कम प्राथमिकता देल जाइत छै।
2. अध्यक्ष/अध्यक्षा:
-पहिलेक प्रयोग: 'अध्यक्ष' पुरुषक लेल, 'अध्यक्षा' स्त्रीक लेल।
- आधुनिक प्रयोग: केवल 'अध्यक्ष' लिंग-निरपेक्ष रूपमे। उदाहरण: - "सुनीता अध्यक्ष छथि।"
- नेपाल सरकारक दस्तावेज आ मिडियामे 'अध्यक्षा'क प्रयोग कम देखल जाइत छै।
- वर्जित: 'अध्यक्षा'क प्रयोग लैंगिक समानताक नीति अंतर्गत कम प्रचलित छै।
3. डाक्टर:
- पहिलेक प्रयोग: कखनो कखनो क्षेत्रीय स्तर पर 'डाक्टरनी' स्त्री चिकित्सकक लेल प्रयोग होइत छल।
- आधुनिक प्रयोग: 'डाक्टर' लिंग-निरपेक्ष छै। उदाहरण: - "डा. राधा डाक्टर छथि।"
- कारण: 'डाक्टरनी' जकां शब्द लिंग-आधारित भेद देखाबैत छल, तें एकर प्रयोग कम कएल गेल छै।
4. प्रहरी (पुलिस):
- पहिलेक प्रयोग: 'प्रहरी' पुरुषक लेल, आ कखनो 'महिला प्रहरी' स्त्रीक लेल।
- आधुनिक प्रयोग: 'प्रहरी' सर्वलैंगिक। उदाहरण: - "सीता प्रहरी छथि।"
- 'महिला प्रहरी'क प्रयोग सेहो कम कएल जाइत छै, कियाकि 'प्रहरी' अपनेमे लिंग-निरपेक्ष छै।
5. नेता/नेत्री:
- पहिलेक प्रयोग: 'नेता' पुरुषक लेल, 'नेत्री' स्त्रीक लेल।
- आधुनिक प्रयोग: 'नेता' लिंग-निरपेक्ष रूपमे प्रयोग होइत छै। उदाहरण: - "पुष्पा कमल दाहाल नेता छथि।"
- 'नेत्री'क प्रयोग आब कम प्रचलित छै, विशेष रूप स औपचारिक लेखनमे।
लिंग-निरपेक्ष शब्दक प्रयोगक कारण
- लैंगिक समानता: लिंग-आधारित शब्दक प्रयोग लैंगिक भेदभावक संकेत दै सकैत छै, जे नेपालक संविधान (2072) आ लैंगिक समानताक नीतिसँ मेल नहि खाइछ।
-आधुनिकताक प्रभाव: वैश्विक स्तर पर लिंग-निरपेक्ष भाषाक प्रचलन (जेना अंग्रेजीमे 'doctor', 'teacher') सँ प्रभावित होइत, नेपाली भाषामे सेहो एकर अनुकरण भँ रहलछ ।
- सामाजिक स्वीकार्यता: लिंग-आधारित शब्दक प्रयोग कम करब स समाजमे समानताक भावना बढ़ैछ।
मैथिली संदर्भमे टिप्पणी
मैथिली, जे नेपालक मधेश क्षेत्रमे व्यापक रूपसँ बोलल जाइछ, मे सेहो लिंग-निरपेक्ष शब्दक प्रति रुझान बढ़लछ, मुदा लोक-प्रयोगमे 'सराइन' जकां नव शब्द रचनात्मकतासँ बनलछ । प्रा.कापडीद्वारा उल्लेखित 'सर' सँ 'सराइन' बनओल गेल प्रसंग मैथिलीके जीवंत परंपराक हिस्सा भँ सकैछ, मुदा नेपालक लैंगिक समानताक नीतिक संदर्भमे, एकर प्रयोगक लेल सामाजिक स्वीकार्यता आ औपचारिक मान्यता जरूरी छै । जँ 'सर' आ 'सराइन'क बदला 'अध्यापक' जकां लिंग-निरपेक्ष शब्द प्रयोग कएल जाय, त' लैंगिक विभेदक प्रश्न कम उठत। उदाहरण: "हमर अध्यापक डा. यादव छथि।" (पुरुष वा स्त्री, दुनु लेल)
< अउर उदाहरणक सुझाव
जँ आगू अउर शब्दक लिंग-निरपेक्ष रूप वा वैकल्पिक प्रयोगक विचार करब, त' निम्नलिखित विचार क' सकैत छी:
- वकिल (वकील): 'वकिलनी'क बदला 'वकिल' लिंग-निरपेक्ष।
- कर्मचारी: 'महिला कर्मचारी'क बदला केवल 'कर्मचारी'।
-पत्रकार: 'पत्रकारनी'क बदला 'पत्रकार'।
नेपालमे लिंग-निरपेक्ष शब्दक प्रयोग लैंगिक समानताक लेल महत्वपूर्ण छै, आ 'शिक्षक', 'अध्यक्ष', 'डाक्टर', 'प्रहरी', 'नेता' जकां शब्द एकर उदाहरण छै। मैथिलीमे 'सराइन' जकां नव शब्द रचनात्मक छै, मुदा एकर प्रयोग लेल सामाजिक आ औपचारिक संदर्भमे विचार जरूरी छै।

Wednesday, 3 September 2025

मैथिली मानकीकरणके नाम पर 'फतबा' के ओरियान !

भारतक राजधानी नयाँ दिल्लीमे मैथिलीके मानकीकरणके नाम पर "फतबा" वा "उलेमा" जारी करबाक ओरियान, अर्थात् कट्टरपंथी वा एकपक्षीय दृष्टिकोण अपनाबेके प्रवृत्ति, शुरू भेल अछि, जे चिंताके विषय छै । अहि विषय पर सामाजिक संजाल फर मिश्रित प्रतिक्रिया देखल गेल अछि । मैथिली समाज अहि विषय पर ध्रुविकृत बनल अछि । ब्राम्हण आ ब्राम्हनेत्तरके रूपमे ध्रुबीकरण चिन्ताक गप्प थिक । एकर वजह नयाँ दिल्ली स्थित मैथिली शोध परिषद् नामक संस्थाद्वारा ओतह 6 सितम्बर 2025 में होबे जा रहल 'मैथिलीक वर्तनी विमर्श हेतु दिल्ली-विद्वत गोष्ठी' बनल अछि । मैथिलीके विद्वान/लेखक/अभियानी डाँ किशन कारिगर, आचार्य रमानन्द मण्डल सहितके विद्वत लोकैन जोरदार विरोध करैत मैथिली भाषामे लोकबोली,लोकशैली आ लोकलयके समावेश करबाक माग कयलक अछि । मैथिलीमे सर्वजन आ सर्वपक्षके समावेश करैत मानकीकरण होबाक चाही, नए त मैथिली धरासाही बनत प्रतिक्रिया सामाजिक संजालमार्फत् ओसभ कहि रहला अछि । मुदा दरभंगा आ मधुबनीके घराना सवर्णके बोली, शैलीके आधार बनाके मानकीकरण होएत त दूर्घटना निश्चित भेल बात सेहो ओसभ जोरदार रूपसँ कैह रहलाछ । दरभंगा आ मधुबनीवाला बोली/शैलीके पृष्टपोषणमे लागल सांभ्रात जातिक लोकसभ कथ्य नै लेख्य शैलीके मानकीकरणके आधार बनेबाक बात कैह रहला अछि ।
मानकीकरणके प्रक्रियामें यदि किछु विद्वान वा समूह एकटा खास शैली (जेना सोतीपुरा मैथिली) वा तत्सम शब्दावलीके थोपैत छथि, आ अंगिका, बज्जिका जेना उपबोली सबके उपेक्षा करैत छथि, त इ भाषाके लोक स्वरूप आ विविधता लेल हानिकारक साबित भए सकैछ।
मानकीकरणमें सब क्षेत्रीय शैली आ उपबोली सबके प्रतिनिधित्व देल जाय। "फतबा" जेना एकपक्षीय निर्णयके बजाय, मिथिला, बज्जिकांचल, आ अंगिकांचलके विद्वानसभके एक मंच पर लावल जाय, जाहि से सहमति आधारित मानक बन सके।
मैथिलीके लोक स्वरूप, जेना तद्भव आ देसी शब्द, आ बोलचालके मुहावराके प्राथमिकता देल जाय । उदाहरण स्वरूप, 'पाणि' आ 'पानी' दुनूके स्वीकार्य बनावल जाय ।
वर्तनीमें भेद, जेना 'ण' बनाम 'न', वा 'ष' बनाम 'स', के पर्यायवाची रूपमें मान्यता देल जाय, जाहि सँ लेखकके रचनात्मक स्वतंत्रता बनल रहए।
मानकीकरणके लेल शब्दकोश, डिजिटल टूल आ शिक्षण सामग्री विकसित कायल जाय । संगैह, विद्यापति जेना ऐतिहासिक रचनाकारके कृतिके मूल रूपमें संरक्षित करबाक चाही, न कि शुद्ध मैथिलीमें बदलल जाय ।
"उलेमा" जेना दृष्टिकोणके बजाय, मैथिली भाषी समुदाय, साहित्यकार, आ शिक्षकसभके राय लेल जाय, जाहि सँ मानकीकरण सर्वस्वीकार्य हो।
मैथिलीके मानकीकरण जरूरी छै, मुदा एकर लेल समावेशी, लोक-केंद्रितङ आ लचीला दृष्टिकोण अपनावल जरूरी छै। "फतबा" वा कट्टर नियम थोपला सँ भाषाके सांस्कृतिक धरोहर कमजोर होय सकैछ। सब क्षेत्रीय विविधताखके समन्वय सँ एकटा मजबूत आ जीवंत मानक मैथिली बनावल जा सकैछ ।

Monday, 1 September 2025

काका’क बात ! (#मैथिली लघुकथा)

अमेरिकामे क्रियाशील संस्था 'एसोसिएसन अप नेपाली तराइयन इन अमेरिका (एएनटीए) अर्थात् 'एन्टा'के 8म् महाधिवेशन तथा 20म् वार्षिकोत्सवके अवसरमे प्रकाशित 'सोभेनियर'मे छपल मैथिली लघुकथा !
रमेशके गामसँ राजधानी ऐला एक सप्ताह भ' गेल रहैक । राजधानी एलाक बादो गामक मुटकुन काका'क मोन ओकरा पड़ैत अछि। गाममे रहैत काल काका संग भेल संवाद आब रमेशके जीवन, परिवार, समाज आ देशक विकास लेल सूत्र जेकाँ बुझाइतछ ।
मुटकुन काका एक दिन मोनक बात बजैत कहलनि, ‘बाबू! तूँ सभ गाम छोड़ि क' बाहर चलि गेलहँ, नीक कएलहँ। एत' त' आब रहबाक स्थिति नहि रहल अछि। किछु कथित अगुआ लोकनि गामकेँ बर्बाद क' देलक अछि । घर-घरमे झगड़ा लगा देलक अछि....!’
मुटकुन काका निरंतर बाजि रहल छलाह। बीचमे रोकि क' रमेश पुछलक, ‘काका! के अगुआ? के-के छथि ओ लोकनि ?’
काका (थोड़ेक कड़क स्वरमे): ‘हैट ! गामक बच्चा-बच्चा जनैत अछि । सभसँ पुछह, कहि देतह। हम बूढ़ा छी, नाम नहि लेब । भित्तोमे कान होइत छै। जँ केओ सुनि देलक त' ओ लोकनि मैदान (खुला दिशा-पिशाबक स्थान), पैनछुवा , चौरचरण (पशु चरबाक स्थान) सब बंद करबाक हुकुम द' देत। फेर हम गरीब...!'
मुटकुन काकाक बात सुनि क' हुनकर मनमे भय देखल जा सकैत छल । रमेशक’ ओह निष्कर्ष छलैक।
रमेश (काकाक काँध पर हाथ राखि क' हुनकर मुंह दिस तकैत): ‘काका ! एहो युगमा अहाँ डराइत छी ?’
काका खिसिआ गेलनि। चारू कात तकैत गमछासँ पगड़ी कसि क' बाँधलनि आ कहलनि, ‘ रमेश बाबू! हम डरायल नहि छी, फालतू झंझटमे पड़' नहि चाहैत छी...। हमरा पर पंचैती बसाय देत से डर अछि । पंचैतीमे खैनी-बिडी, सुपारी जे खर्च करए पडैक छैक…। पंचैतीक नाम पर किछु बेरोजगार लोकक दिन एही तरहेँ कटैत अछि।’
गाममे रोज होइत फालतू पंचैतीक प्रति मुटकुन काकाक आक्रोश सुनि रमेश हुनकर पहिल बात पर ध्यान देबाक प्रयास कएलनि। पुछलनि, ‘काका ! कक्कर-कक्कर घरमे झगड़ा अछि ?’
काका : ‘कहब कठिन अछि, रमेश बाबू। कक्कर-कक्कर नाम कहब...?’ लंबा साँस लैत काका आगाँ कहलनि, ‘रमेश बाबू ! जई घरमे सहोदर भाइ-भाइमे प्रेम होइत अछि, जेठ-बड़केँ सम्मान भेटैत अछि, ओत' भगवानक वास होइत अछि। प्रेम टूटल त' रामायण लिखायल, संपत्ति बाँटल त' महाभारत । मनुष्यक पतन तखन शुरू होइत अछि, जखन ओ अपनाकेँ गिराब' लेल दोसरसँ सलाह लेब शुरू करैत अछि...!’
मुटकुन काका रमेशसँ समय पुछलनि, बिहानक ११ बजल छल। जलखोई करबाक रमेशक आग्रह पर काका कहलनि, ‘स्नान-ध्यानक बादे करब …! ‘ एतेक बाजैत काका पुरनी पोखरी दिस चलि गेलाह। रमेश , काकाके अंतिम बात पर सोचैत सोफा पर बैसल रहल।
- दिनेश यादव (लेखक/पत्रकार/अध्येयता), राजगढ-06, फकिरा, सप्तरी (मधेश प्रदेश)

Sunday, 31 August 2025

अन्न–धन लक्ष्मी

यो कथा रामभरोस कापडिको मैथिली कथासंग्रह ‘एन्टिवायरस’ मा प्रकाशित ‘अन्न–धन लक्ष्मी’ को पत्रकार दिनेश यादवले गर्नुभएको नेपाली अनुवाद हो । यो कथा कान्तिपुर दैनिकमा ९ कात्तिक २०७६ को कोशेली परिशिष्टमा प्रकाशित छ ।
-रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’
कार्तिक ९, २०७६, कान्तिपुर (कोसेली)
कुनै एउटा राजमार्गको तल बग्दै गरेको जीवित नदीमाथि बनेको पुल  । साठी–सत्तरी मिटर लम्बाइ हुनुपर्छ  । तल हरियो–कञ्चन पानी बगिरहेको छ । एउटी युवती जो अत्यन्तै राम्री छिन्, सुरुवाल–कुर्थामा सजिएकी तिनी पुलको रेलिङ समातेर धेरै समयअघिबाट तल नदीको पानीतिर हेरिरहेकी छन् । अर्थात् तिनी पुलबाट तलको दूरी नापिरहेकी छन् । त्यसै बेला एक जना पुरुष पूर्वबाट पश्चिमतिर पुल हुँदै गइरहेका देखिन्छन् । युवतीले जब एउटा पुरुष आफूतिरै आइरहेको देख्छिन्, उनको अनुहारमा केही क्षणकै लागि भए पनि प्रसन्नता बिजुली चम्केको जस्तो भान हुन्छ । फेरि तिनी पुरानै कुरो तलको पानीतिर हेर्न थाल्छिन् ।
पुरुष नजिकै आउँछन् । उनको चाल–ढालले लाग्छ कि उनलाई युवतीको त्यहाँ उभिनुको कुनै मतलबै छैन । उनी ती युवतीप्रति कुनै ध्यानै नदिएको जस्तो देखिन्छन् । पाइन्ट–सर्ट लगाएका ती पुरुष पच्चीस–छब्बीस वर्षभन्दा बढी उमेरका सायद थिएनन् । ती युवक जब सहज भावबाट आफूतिर नहेरीकनै अगाडि हुइँकिन्छन्, तब युवतीको चेतना फर्किन्छ । तिनी आश्चर्य मान्दै युवकतिर हेर्न पुग्छिन् । तिनलाई यो लागिरहेको थियो कि ती युवकले आफूलाई यो अवस्था देखेपछि एकपटक सोधपुछ गर्लान् । अर्थात् कुनै किसिमबाट प्रतिक्रिया जनाउनेछन् । त्यो नभएपछि युवती केही बेर विचलित हुन्छिन् । टाउको पश्चिमतिर फर्काउँदै युवकलाई सम्बोधित गर्दै आफ्नोतर्फ ध्यान केन्द्रित गराउँछिन् ।
युवती– ‘हजुर, सुन्नुस् त ।’ युवक केही बेर यताउत्ति हेर्छन् कसैलाई आफ्नो अगाडि र पछाडि नदेखेपछि आवाजतिर आफ्नो मुन्टो उठाउँछन् । युवती– ‘म तपाईंलाई नै बोलाइरहेकी छु ।’ युवक– (युवक केही वेर आश्चर्यमा पर्छन् अनि सोच्छन्ः अनजान कुनै युवती नजिक एक्लै जानु उचित/अनुचित, सम्भवतः त्यही गुनधुन गर्न थाल्छन् । ) युवती– ‘यता आउनु न ?’ युवक– ‘के कुरो होला ?’ युवती केही नरम भावमा भन्छिन्, ‘तपाईं यता आएपछि पो त !’ युवक अलिक धकाउँदै युवतीको नजिक पुग्छन् । ती युवतीको आँखामा प्रश्नवाचक दृष्टिले हेर्छन् । युवती– ‘(आश्वस्त पार्दै) यहाँ कुनै प्रकारको शंका–उपशंकाको गुन्जाइस छैन । मलाई एउटा मात्र कुरो सोध्नु थियो ।’ युवक– ‘ए.. के कुरो ?’
उनी टासिँदै युवतीको अगाडि पुग्छन् । युवती अब फेरि आफ्नो आँखा पुलको तल कलकल बगिरहेको नदीको पानीमा दौडाउँछिन् र युवकलाई अझै नजिक आउन आग्रह गर्दै भन्छिन्, ‘भन्नुस् त यो नदी कत्ति गहिरो होला ?’ युवक पहिले त अवाक हुन्छन् । उनले त नापेको छैन, तर अभियन्ता हुन्, त्यसैले अनुमान लगाउन सक्छन् । सामान्य रूपमा युवतीलाई उत्तर दिँदै भन्छन्, ‘अँ.. यो बीस–पच्चिस मिटर त पक्कै होला ।’ युवती सोध्छिन्, ‘माथिबाट हाम फाल्दा यो नदीमा डुबेर मर्न सकिएला त ?’ युवक आश्चर्य मान्दै युवतीतिर हेर्छन् । केही बोल्दैनन् । लाग्छ, उसको मनमा केही द्वन्द्व चलिरहेको छ । के जवाफ दिऊँ या यस्तो प्रश्न किन सोधिन् ।
त्यत्तिकैमा युवतीले फेरि त्यही प्रश्न दोहोर्‍याउँदै भनिन्, ‘हजुर, भन्नु न । पुलबाट यो नदीमा हाम फालेर कोही मर्न सक्छन् ? ’ युवक एकपटक तल बगिरहेको पानीलाई निहार्दै युवतीमाथि आँखा टिकाउँदै भन्छन्, ‘अवश्य डुबेर मर्न सक्छन् । तर तपाईंले यो प्रश्न किन गर्दै हुनुहुन्छ ?’ युवती फेरि हेर्दै जवाफ फर्काउँछिन्, ‘यो कारणले कि म पुलबाट हाम फालेर मर्न चाहन्छु ।’ युवक अवाक पर्छन् । यी युवती किन मर्न चाहन्छिन् ? उनी पहिलोपटक केही स्थिर हुँदै युवतीतिर हेर्छन् । सुरुवाल–कुर्थामा सजिएकी सुन्दरी यी युवती पढे लेखेकी जस्तो पनि देखिन्छिन् । उमेर २०–२२ वर्ष होला । ज्यान फाल्ने त केही कारण पक्कै होला । उनी आफैं यन्त्रभावले घरबाट निस्केर जीवनलाई तहसनहस हुन छाड्ने संकल्पका साथ यत्ता आएका रहेछन् । संसारिक सुखभोग प्राप्तिबाट वितृष्णा उत्पन्न भइसकेको छ, उनलाई । त्यसको पनि कारण छ । सम्भव छ, पुलमाथि हाम फाल्ने निर्णय गर्ने युवतीको पछाडि पनि त केही बलियो कारण हुन सक्छ ।
युवक सोध्छन्, ‘तपाईं यस्तो सोच्न कसरी सक्नुहुन्छ ? युवती उत्सुक हुन्छिन्, ‘मतलब, म मरे तपाईंलाई किन चाँसो ? हो, म मर्न चाहन्छु । अब तपाईं जान सक्नुहुन्छ ।’ युवतीको यो रूखोपनबाट युवक आहत हुन्छन् । तर उनी सम्हालिन्छन् । मनभित्र यो भारी बोकेर उनलाई त्यहाँबाट हिँड्न मन लागेन ।
उनी आफ्नो पीडा केही समयका लागि बिर्सिदिन्छन् । युवती उनलाई रहस्यमय लाग्न थाल्छ । उनको भित्रसम्मै पुग्न आवश्यक ठानेर युवतीको रूखो व्यवहारलाई चटक्कै बिर्सेर फेरि प्रश्न गर्दै बस्छन्, ‘तपाईंको यो उमेरमा यस्तो खतरनाक निर्णयसम्म पुर्‍याउने बाध्यता केले दिलायो ?’
‘तपाईंहरूले,’ आवेशमै युवतीले बोलिन् । यो कुरा भनिरहँदा उसको आँखा युवकको आँखासँग एकाएक जुध्न पुग्छ । र फेरि तत्कालै नदीको पानीमा भासिन्छ ।
‘हैन,’ मैले त केही गरेकै छैन । भेटघाट पनि अकस्मात भयो । न कहिले देखेको न चिनेको । फेरि मेरो दोष कसरी ?’ ‘म तपाईंलाई मात्रै भनेको छैन । तपाईंको जुन जाति छ, पुरुष जाति, त्यसलाई भन्या हुँ । मेरो यो कठोर निर्णय गर्नुको पछाडि यस्तै पुरुषहरूले गर्ने अत्याचार हो ।’
युवकको जिज्ञासा झनै बढ्यो । उनी सोध्छन्, ‘कस्तो अत्याचार ?’
युवतीको घाँटी तलतिर तन्किएकै छ । उनी उत्तर दिन्छिन्, ‘जानुस्, तपाईं यो झमेलामा किन पर्नुहुन्छ ? कति राम्रोसँग तपाईं आफ्नो बाटोतिर लागिरहनुभएको थियो । बेकारै तपाईंलाई डाकेछु ।’
‘ल, तपाईंले नजिक बोलाइहाल्नुभयो, कुरा पनि त भनिदिनुस् । जुन भारी बोकेर म हिँडिरहेको छु, त्यसमा केही नयाँपन होस् र मेरा भारी पनि केही हलुको होस् ।’ ‘त्यस्तो कुन भारी तपाईंमाथि छ ? कस्तो राम्रो त हुनुहुन्छ । ’ ‘मात्र यही कुरो छ आईमाईमा । आफूमाथि पर्‍यो भने पोखरी–जलाशय वा नदीमा डुबेर मर्न चाहन्छिन् । र जब पुरुषमाथि जुल्म हुन्छ, तब उनको रूप–रंगमाथि ध्यान दिन थाल्छन् । छोड्नुस् मेरो कुरो, पहिले तपाईं भन्नुस् ।’ ‘होइन, पहिले तपाईं भन्नुस् । म पनि बुझ्न चाहन्छु ।’ ‘त्यसो भए पहिले कसले बोलायो ?’ ‘मैले ।’ ‘कुरो कसले अगाडि बढायो ?’ ‘मैले ।’ ‘त्यसो भए कुरा कसले फर्साउने पहिले ?’ ‘कुरो त ठीकै हो । भन्न त मैले नै पर्छ ।’
युवक अब आश्वस्त हुँदै भन्छन्, ‘जे होस्, तपाईंलाई ज्ञान त भयो । अब भन्नुस तपाईं यो भुतही नदीमा किन हाम फालेर ज्यान दिन चाहनुभएको थियो ?’ युवती अब केही थाकेको र हारेको जस्तो देखिएकी छन् । उनी एकपटक गहिरो नदीमा आफ्नो नजर दौडाउँछिन् । मुखमा आएको क्लान्त भावलाई स्थिर गर्दै थुचुक्कै रेलिङ तलको पटरीमा बस्छिन् । उता पुलमाथि छेउमा उभिएका युवक पनि केही नजिकिँदै युवतीकै छेउमा बस्छन् । दुवैको भित्र संषर्घ जारी छ । कुरो कहाँबाट सुरु गरौं भनेर । युवक, युवतीतिर गहिरो नजरले हेर्दै सोध्छन्, ‘के हो तपाइँको कथा, जो यस्तो दुःखद निर्णय गर्न पुग्नुभएको थियो ?’ ‘ठीक छ, म सुनाउँछु । तर मेरो निर्णय भने अटल छ नि । मेरा लागि अब कुनै अर्को विकल्प बाँकी छैन ।’ ‘पहिला भन्नुस् न त ?’
युवती भन्छिन्, ‘मेरो बुबा भोकभोकै बसेर मलाई मैट्रिकसम्म पढाउनुभयो । उहाँको मन थियो, छोरी सुन्दरी छँदै छिन, पढे–लेखेमा कम दाइजोमै विवाह भई घरजम भइहाल्छ । तर जब धेरै प्रयासको बाबजुद केटा पाउन सक्नुभएन, अत्यधिक दाइजो मागका कारण बुबा गलिसक्नुभएको थियो । मलाई लाग्यो कि मेरै कारणले बुबा गल्नुभयो, थाक्नुभयो, चिन्तित बन्नुभएको छ । त्यसपछि निर्णय गरें कुनै जागिर गरी घरखर्च चलाऊँ । विवाह त पछि गरे पनि भइहाल्यो नि । मैले जागिर पाएँ, एउटा कार्यालयमा । कार्यालय प्रमुख अविवाहित थिए । उनलाई मसँग काम गर्न मन पर्‍यो । मसँग हिमचिम बढाए । कुरो यतिसम्म पुग्यो कि हामी दुवैले विवाह गर्नुपर्छ भन्ने निर्णय गर्‍यौं । उनको प्रेमभाव देखेर म मन्त्रमुग्ध थिएँ । लाग्थ्यो कि अब थकित बुबाको अनुहारमा पहिलेझैं खुसी छाउनेछ । यस्तै चिन्तन–मननमा रमाइरहेको बेला एक रात उनको र मेरोबीच सबै औपचारिक सम्बन्धको अन्त्य भयो । अब तीन–चार महिना भइसक्यो । उसको बच्चा मेरो कोखमा आएपछि उनी मबाट टाढिन र तर्किन थाले । बिहे गर्नबाट मात्रै होइन, कार्यालयमा पनि गलत आरोप लगाएर नोकरीबाटै निकालिदिए । अब मलाई घरमा गएर यो कुरो भन्ने आँट छैन ।
बुबाको पुरानै निराश अनुहार फेरि देखिने त छँदैछ, गाउँटोलमा बदनामी हुने अर्को डर । त्यसैले पानीमा हाम फालेर आत्महत्या मात्रै मेरो परिणति बन्न पुगेको हो । म यहाँ त्यही गन्थनमन्थनमा उभिएकी थिएँ कि हाम फालेर पनि मर्न सकिएन भने अर्को बबाल हुन सक्छ ।’
युवक, युवतीको कथा सुनेर गम्भीर बन्न पुगे । उनको आफ्नो व्यथा ती युवतीको अगाडि झिनो लाग्न थाल्यो । उनी धेरै वर्ष विदेशमा गएर धन कमाएका थिए । आमा–बुबा र एउटी बहिनी मात्रै थिए । बुबाले ऋण काढेर कतार पठाएका थिए । दुई वर्षमा पैसा कमाएर घर फर्केपछि बिहे गरिदिए । चार–पाँच वर्ष खुबै रमाए श्रीमतीसँग । आमा–बुबाले रोकिरहेका थिए, अहिले नजाऊ भने । उनीहरूको मनसाय उनले पछि मात्र बुझे, त्यो थियो— दुलहीको कोख भरिएपछि छोरो विदेश जाओस् । तर पाँच–छ महिनामा केही भएन, ड्युटीमा गइहाले । कतारबाट मलेसिया गए फेरि दुवई पनि पुगे । पढेका थिए, राम्रो काम हात लाग्यो । फेरि दुई वर्षपछि आए ।
योपटक धेरै रकम कमाएर ल्याएका थिए । कर्जा त सकियो नै, पुर्खौली जग्गामा पक्की घर बनाए । घरलाई सजाए, पत्नीलाई गरगहनाको भारी नै बोकाइदिए । बिदा छ महिनाभन्दा बढीको थियो । यो छ महिमा सबैथोक गरे पनि श्रीमतीको कोख भर्न सकेनन् । आमाले धेरै ठाउँ दुहलीलाई लगेर झारफुक गराइन्, धामीझाँक्रीसँग पनि देखाइन् । केही फाइदा भएन । यसैबीच उनी फेरि विदेश हानिए ।
विदेशबाट श्रीमतीको नाममा पटक–पटक रकम पठाइरहेका थिए । उनलाई यो कुरोको कुनै भान थिएन कि चार वर्षसम्म कुनै महिलाले सन्तान नपाए कस्तो अवस्था हुन्छ । उनी रकम पठाइरहेकै थिए । श्रीमतीसँग फोनमा कुराकानी पनि नियमित भइरहेकै थियो । रंगीला गफगाफ गर्न भ्याएकै थिए । वृद्ध आमाबुबालाई पक्की घरमा आराम गर्नुको सुख । सबै आ–आफ्नै धुनमा मस्त थिए । श्रीमती भने एउटा अर्कै खेलमा रमाइरहेकी थिइन् । एक दिन उसले दिएको गरगहना र पठाएको जति सबै रकम लिएर गाउँकै एक अधबैंसे विदुरसँग गइन् । जब यो कुरो उनलाई थाहा भयो, उनलाई आकाशबाट भुइँमा खसेजस्तो भयो ।
उनले मालिकलाई आग्रह गर्दै तत्कालै गाउँ फर्कने भन्दै बिदा लिए । गाउँ आए । गाउँभरि हल्ला फैलियो कि उनीबाट कुनै सखा–सन्तान नभएपछि श्रीमती अरूसँग भागिन् ।
उनलाई यो कुराले निकै ग्लानि भयो । अर्को बिहे गर्दा पनि त्यही सहनुपर्ने भयो । उनले सहर पुगेर आफ्नो जाँच गराए, नतिजा जुन आयो, त्यसबाट पनि उनी निराश भए । चारैतिर अँध्यारो छाएको थियो । पृथ्वी नै पूरै घुमिरहेजस्तो उनले अनुभव गर्न थाले । तन स्थिर भए पनि उनको मन जति गर्दा पनि स्थिर हुनै सकेन । घर फर्किने आँटै उनले गर्न सकेनन् । उनी उतै बरालिन थाले । सम्भवतः उनी पहिलो पटक आफ्नो जीवनमा लक्ष्यविहीन बन्न पुगेका थिए । बाँचू वा मरूँ । र यही अवस्थामा यो पुलमा एउटी युवतीसँग भेट भएको थियो ।
युवतीले जब यो कथा सुनिन्, अवाक बन्न पुगिन् । मृत्युको मुखमा जाने निर्णय गर्ने यी दुई जनाको कथा उस्तै–उस्तै थियो । एउटा पुरुषसँग प्रताडित र अर्को महिलासँग विक्षिप्त । त्यसपछि के ?
पुरुष उठ्छन् । महिला पनि उठ्छिन् । दुवै दक्षिणतिर मुख फर्काएर तल बग्दै गरेको नदीलाई हेर्छन् । दुवै हातले रेलिङलाई बलियोसँग समात्दै एक–अर्कालाई हेर्छन् । दुवैको आँखाबाट आँसुका धारा बग्न थाले । आँखा बन्द गरेर केही स्मरण गर्दै दुई खुट्टालाई नदीतिर फर्काएर दुवै एकैसाथ पानीमा हाम फाल्न खोजेको जस्तो देखिन्थ्यो । दुवैको कथा एकअर्कालाई उद्वेलित गर्छ ।
तर त्यसपछि के भयो, थाहा भएन । युवक, युवतीतिर हेर्छन् । आँखाले आफ्नो कथा एक–अर्कालाई बताइरहेको छ । दुवै पुलको माथिल्लो भागबाट खुट्टा र हात तल झार्छन् । उत्तरतिर मुख फर्काउँछन् । युवक आफ्नो दायाँ हात युवतीतिर बढाउँछन् । युवती बिनाहिच्किचाहटको हात अगाडि बढाउँछिन् । युवक उनको हातलाई दायाँ हातले दबाउँदै बायाँ हातले कस्दै पूर्व दिशातिर लाग्छन् । दुवैको अनुहारमा अन्न, धन, लक्ष्मी प्राप्त भएको खुसी छाउँछ । (मैथली कथासंग्रह ‘एन्टिवायरस’ बाट । अनुवाद : दिनेश यादव ।)
https://ekantipur.com/koseli/2019/10/26/157206551735827382.html

Tuesday, 29 July 2025

जामुन का पेड (व्यङ्ग कथा)

हिन्दी र उर्दु साहित्यका मुर्धन्य लेखक कृष्ण चन्दरको एउटा कथा छ – जामुनका पेड ।
सरकारी सचिवालयको प्रांगणमा रहेको एउटा बुढो जामुनको रुख एक राति चलेको हुरिले ढल्छ । बिहान उठ्दा सचिवालयको मालीले देख्छ — ढलेको त्यही जामुनको रुखमुनि एउटा मान्छे थिचिएको हुन्छ । रुखले थिचिएको व्यक्तिले आफ्नो जीवन बचाइदिन मालीसँग याचना गर्छ ।
मालीले रुखमुनि थिचिएको व्यक्तिले जीवन जोगाइदिन गरेको प्रस्ताव कार्यालयको पियूनलाई सुनाउँछ । पियून कर्मचारीलाई भन्न जान्छ । कर्मचारी सुपरिटेन्डेन्टलाई भन्न जान्छ । सुपरिटेन्डेन्ट उपसचिव कहाँ जान्छ । उपसचिव सहसचिव कहाँ जान्छ । सहसचिव मुख्य सचिव भएको ठाउँ जान्छ । एउटा सिंगै फाइल तयार हुन्छ ।
जोगाउनुपर्ने ढलेको जामुनको रुखले थिचिएको मान्छे थियो, तर सरकारी अड्डाको प्रक्रियाले ढलेको जामुनको रुख नै मुख्य विषय बन्न पुग्छ ।
जामुनको रुख फलफूल भएकाले मुख्य सचिवबाट फाइल बागवानी विभागमा जान्छ । सचिवालयको लेनमा रोपिएको रुख भएकाले बागवानी विभागले फाइल कृषि विभागमा पठाउँछ । बुझ्दै जाँदा रुखले च्यापिएको व्यक्ति शहरको नामुद सायर भएको खुल्न आउँछ । मामला संस्कृति विभागतर्फ मोडिन्छ ।
व्यंग्यभरि यो कहानी यति चोटिलो छ कि – सरकारी कर्मचारीतन्त्रको निवेदन दिनेदेखि फाइल सार्नेसम्मका प्रक्रियामाथि थपिने प्रक्रिया पूरा गरेर जतिबेला ढलेको जामुनको रुख हटाउने निर्णय गरिन्छ, त्यतिबेलासम्म रुखले च्यापिएको त्यो मान्छेको मृत्यु भइसक्छ ।
चन्दरको यो बेजोड कथा तत्कालीन भारतको सुस्त र कथित प्रक्रियामुखी सरकारी काम कारवाहीमाथिको सानदार व्यंग्य थियो । अहिले विश्वको चौथो अर्थतन्त्र भारतमा लाल फीताशाही त कहाँ न कहाँ कम भयो भनिन्छ । तर, चन्दरको उक्त कथा नेपालको सरकारी काम कारबाहीसँग धेरै हदसम्म मेल खान्छ ।
(नेपाल भ्यूजमा 13 साउन 2082 मा संजीव सत्गैंयाले लेख्नुभएको 'चरम घामले लागेको सुक्खामा (कु)शासनको रुखमुनि थिचिएका जनता' टिप्पणीबाट साभार गरिएको केही अंश/ स्केचको स्रोत : Nepalviews)